इशरत लखनवी
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पहचान: उर्दू के प्रतिष्ठित कवि, शब्दकोशकार, व्याकरणाचार्य और उर्दू संरक्षण के सक्रिय प्रवक्ताख्वाजा मुहम्मद अब्दुल रऊफ़ ख़ान उर्फ़ इशरत लखनवी का जन्म 19 जून 1868 को लखनऊ में हुआ। वे उर्दू के प्रसिद्ध कवि, लेखक, शब्दकोशकार, शोधकर्ता तथा उर्दू भाषा के संरक्षण और प्रसार के लिए सक्रिय साहित्यिक व्यक्तित्व थे। उनका शुमार उन साहित्यकारों में होता है जिन्होंने केवल कविता ही नहीं की, बल्कि उर्दू की भाषिक नींव, व्याकरण, मुहावरों और शब्दकोश-निर्माण में भी महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।इशरत लखनवी का संबंध बल्ख के शाही वंश से था। उनके पूर्वजों में अब्दुल शकूर ख़ान दिल्ली से फ़ैज़ाबाद आए, जहाँ नवाब शुजा-उद-दौला ने उन्हें ख़ान बहादुर की उपाधि और इलाहाबाद किले की क़िलेदार नियुक्ति प्रदान की। बाद में यह परिवार लखनऊ आ बसा। उनके पिता ख्वाजा मुहम्मद अब्दुल शकूर नवाबगंज (गोंडा) के थानेदार रहे।उन्होंने प्रारम्भिक शिक्षा मौलवी उम्मीद अली क़दवई से प्राप्त की और बाद में अपने मामा मौलवी मेहदी हसन से फ़ारसी पढ़ी, जिसमें कम आयु में ही प्रवीणता प्राप्त कर ली। अरबी की शिक्षा मौलवी फ़तह मुहम्मद लखनवी और मौलवी फ़रियाद हुसैन मुरादाबादी से प्राप्त की। घरेलू ज़िम्मेदारियों के कारण उनकी औपचारिक शिक्षा शीघ्र रुक गई, किंतु स्वाध्याय जारी रहा।जब उन्हें शायरी का शौक़ हुआ तो उन्होंने शेख मुहम्मद जान शाद से इस्लाह ली। उनकी असाधारण प्रतिभा देखकर शाद ने उन्हें ग़ज़ल कहने की अनुमति दी। इशरत लखनवी ने कविता में मीर तकी मीर की सरल, मुहावरेदार और प्रभावशाली शैली को अपना आदर्श बनाया तथा अत्यधिक फ़ारसीमय जटिलता से परहेज़ किया। उनके अनुसार अच्छा शेर वह है जो स्पष्ट, सहज, अर्थपूर्ण, हृदयस्पर्शी और मुहावरेदार हो।इशरत लखनवी की साहित्यिक प्रतिभा केवल कविता तक सीमित नहीं थी; वे उर्दू शब्दकोश, व्याकरण और मुहावरों के भी बड़े विद्वान थे। उन्होंने उर्दू भाषा के मुहावरों, क्रियाओं, धातुरूपों, संज्ञाओं और व्याकरण पर अनेक महत्त्वपूर्ण पुस्तकें लिखीं। उनकी प्रमुख कृतियों में इस्लाह-ए-ज़बान-ए-उर्दू, ज़बान दानी, ख़ुम खाना-ए-इशरत, लुग़ात-ए-उर्दू, आब-ए-बक़ा, बेगमों का दरबार, हिन्दू शुअरा, क़वायद-ए-मीर, तथा शायरी की पहली, दूसरी, तीसरी, चौथी और पाँचवीं किताब शामिल हैं; अंतिम श्रृंखला पाँच भागों पर आधारित है जिसमें काव्यशास्त्र, तकनीकी पक्ष और शायरी के सिद्धांतों पर विस्तार से चर्चा की गई है।वे लखनऊ की प्रसिद्ध साहित्यिक संस्था अंजुमन इस्लाह-ए-सुख़न के सचिव रहे, जो उर्दू भाषा के संरक्षण हेतु स्थापित की गई थी। इस मंच से उन्होंने उर्दू के प्रसार, उसकी भाषिक शुद्धता और मुहावरेदार मानक के संरक्षण के लिए व्यापक कार्य किया। उर्दू के समर्थन में उनके लेख उपमहाद्वीप के अनेक समाचारपत्रों और पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए तथा उनकी वैचारिक कोशिशों ने उर्दू-प्रसार आंदोलनों को शक्ति प्रदान की।निधन: 9 जून 1940 को लखनऊ में उनका निधन हुआ।