अमीन अहसन इस्लाही
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पहचान: प्रसिद्ध आलिम-ए-दीन, क़ुरआन के मफ़स्सिर और इस्लामी चिंतकमौलाना अमीन अहसन इस्लाही का जन्म 1904 में आज़मगढ़ के गाँव बम्हौर में हुआ। उनकी प्रारंभिक शिक्षा गाँव के मकतब में हुई। बाद में उनके रिश्ते के चाचा मौलाना शिबली मुतकल्लिम नदवी (मदरसा इस्लाह के महतमिम) के सुझाव पर उन्हें मदरसा इस्लाह, सराय मीर में दाख़िल किया गया, जहाँ आठ वर्षों में उन्होंने अरबी, क़ुरआन, हदीस और फ़िक़्ह में गहरी दक्षता हासिल की।1922 में मात्र 18 वर्ष की आयु में उन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत की और साप्ताहिक ‘मदीना’ (बिजनौर) के सहायक संपादक बने। इसके अलावा बच्चों के पत्र ‘गुंचा’ का संपादन किया और मौलाना अब्दुल माजिद दरियाबादी के साप्ताहिक ‘सच’ से भी जुड़े रहे।1925 में उन्होंने पत्रकारिता छोड़कर अपने उस्ताद मौलाना हमीदुद्दीन फराही के मार्गदर्शन में क़ुरआनी अध्ययन में विशेषज्ञता हासिल की। उन्होंने न केवल तफ़सीर सीखी बल्कि ‘नज़्म-ए-क़ुरआन’ के सिद्धांत में भी महारत प्राप्त की। उनकी पूरी ज़िंदगी अपने उस्ताद के विचारों को आगे बढ़ाने में लगी रही।वे जमाअत-ए-इस्लामी के प्रारंभिक सदस्यों में थे और मौलाना मौदूदी के बाद महत्वपूर्ण व्यक्तित्व माने जाते थे, लेकिन 1958 में मतभेदों के कारण अलग हो गए। बाद में डॉ. इसरार अहमद के साथ ‘तंज़ीम-ए-इस्लामी’ के गठन की कोशिश की, जो सफल न हो सकी।उनकी सबसे बड़ी कृति ‘तदब्बुर-ए-क़ुरआन’ है, जो 1980 में पूर्ण हुई। यह उनकी 55 वर्षों की मेहनत और उनके उस्ताद की सोच का निचोड़ है, जिसे उन्होंने “एक सदी का क़ुरआनी चिंतन” कहा।इसके बाद उन्होंने हदीस के क्षेत्र में कार्य किया और 1401 हिजरी में ‘इदारा तदब्बुर-ए-क़ुरआन व हदीस’ की स्थापना की तथा ‘तदब्बुर’ नामक शोध पत्रिका जारी की। 1993 में स्वास्थ्य कारणों से उनके दर्स बंद हो गए।निधन: 15 दिसंबर 1997 को उनका इंतक़ाल हुआ।